नीति
दिल्ली के नए मतपत्र नियम राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप, लेकिन नागरिकों का सीधा प्रभाव सीमित
मतपत्र प्रस्तावों और जनमत संग्रह के मामले में दिल्ली का रवैया देश के कई अन्य प्रमुख शहरों की तुलना में अधिक प्रतिबंधात्मक बना हुआ है, जिसका असर स्थानीय नीतिगत फैसलों में नागरिकों की भागीदारी पर पड़ रहा है।
हमने यह रिपोर्ट कैसे तैयार की

दिल्ली सरकार ने हाल ही में मतपत्र प्रस्तावों और जनमत संग्रह से जुड़े अपने ढांचे को स्पष्ट किया है। इसके तहत नागरिकों द्वारा सीधे प्रस्ताव रखने पर पाबंदी बरकरार रखी गई है, हालांकि विशेष परिस्थितियों में सीमित विधायी जनमत संग्रह की अनुमति दी गई है। यह अपडेट मुख्य रूप से उन दिल्लीवासियों को प्रभावित करता है जो चुनावों में मतदान से परे लोकतांत्रिक निर्णय-प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं।
यह नीतिगत स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया है जब पूरे देश में अधिक प्रत्यक्ष लोकतांत्रिक साधनों की मांग बढ़ रही है। मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में हाल के सुधारों के जरिए मतदाताओं को कर परिवर्तनों और स्थानीय बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर जनमत संग्रह में भाग लेने का अधिकार दिया गया है। राष्ट्रीय संदर्भ में, सार्वजनिक मत के जरिए नीतियां प्रस्तावित करने या रद्द करने की शक्ति को लेकर प्रतिनिधि सरकार और नागरिक भागीदारी के बीच संतुलन पर बहस जारी है।
दिल्लीवासियों के लिए सीमित प्रत्यक्ष लोकतांत्रिक अधिकार
कई अन्य बड़े शहरों में नागरिक हस्ताक्षर अभियान चलाकर प्रस्ताव ला सकते हैं, लेकिन दिल्ली के मौजूदा कानून नागरिकों को विधायी प्रस्ताव या निरसन पहल सीधे मतपत्र पर लाने का कोई औपचारिक अधिकार नहीं देते। जनमत संग्रह केवल दिल्ली विधान सभा या उपराज्यपाल द्वारा बुलाया जा सकता है, और वह भी आमतौर पर उन्हीं मुद्दों पर जिन्हें निर्वाचित अधिकारी अहम मानते हों।
इसका मतलब यह है कि दिल्लीवासी स्वतंत्र रूप से कोई जनमत प्रश्न नहीं उठा सकते। यह स्थिति शहरी विकास, सार्वजनिक परिवहन के वित्त पोषण या पर्यावरण नियमों जैसे मुद्दों पर जन भागीदारी को प्रभावित कर सकती है। उदाहरण के लिए, यदि कोई नागरिक किसी नई संपत्ति कर या परिवहन नीति को चुनौती देना चाहे, तो उसे ऐसे मामले जनमत संग्रह तक पहुंचाने के लिए निर्वाचित प्रतिनिधियों पर निर्भर रहना होगा, जिससे जमीनी स्तर पर वकालत की ताकत सीमित हो जाती है।
तुलनात्मक आंकड़े और नीतिगत निहितार्थ
गृह मंत्रालय और दिल्ली राज्य निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 2020 के बाद से दिल्ली में नागरिकों द्वारा शुरू किया गया कोई भी मतपत्र प्रस्ताव सामने नहीं आया है। इसके विपरीत, बेंगलुरु में 2022 से 2025 के बीच जल प्रबंधन से लेकर सार्वजनिक स्थलों के उपयोग तक पांच नागरिक-प्रायोजित जनमत संग्रह हुए। इसी अवधि में मुंबई ने परिवहन विस्तार पर तीन जनमत संग्रह आयोजित किए। इन दोनों शहरों में नागरिक पहल के लिए स्पष्ट वैधानिक व्यवस्थाएं मौजूद हैं।
2025 के नगर निगम चुनावों में दिल्ली की कुल मतदाता भागीदारी लगभग 48% रही, जो मुंबई के 60% और बेंगलुरु के 57% से कम है। विश्लेषकों का कहना है कि प्रत्यक्ष भागीदारी के अवसर बढ़ाने से मतदाताओं की सक्रियता और समुदाय का भरोसा बढ़ सकता है, हालांकि ऐसे बदलावों को प्रशासनिक क्षमता और कानूनी सुरक्षा उपायों के साथ संतुलित करना जरूरी होगा।
दिल्ली के 2026-27 के बजट में चुनावी प्रक्रिया के आधुनिकीकरण के लिए 22 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जिसमें सार्वजनिक परामर्श मंचों में संभावित सुधार शामिल हैं। हालांकि, नागरिक-नेतृत्व वाली मतपत्र पहल को सक्षम बनाने के लिए अभी कोई अलग धनराशि निर्धारित नहीं की गई है।
आगे देखें तो नीति विशेषज्ञों को उम्मीद है कि अन्य शहरों के अनुभवों का हवाला देते हुए वकालत समूह दिल्ली में नागरिक पहल प्रक्रिया शुरू करने की मांग फिर से उठा सकते हैं। हालांकि, सरकारी अधिकारी जोर देकर कहते हैं कि प्रत्यक्ष मतपत्र अधिकार का दायरा बढ़ाने से पहले शासन की दक्षता और सामाजिक सौहार्द पर इसके प्रभावों को सावधानीपूर्वक परखा जाना चाहिए।